Tuesday, 19 September 2017

लोकतंत्र

       लकड़बग्घे के हृदय परिवर्तन की घटना पूरे जंगल में चर्चा का विषय बनी हुई थी। सभी शाकाहारी जीव लकड़बग्घे के फैसले पर चकित थे कि कोई मांसाहारी जीव जीव-हत्या न करने का प्रण कैसे ले सकता है, वो भी ऐसे समय में जब पूरा जंगल सूखे की चपेट में हो। वहीँ कुछ जीव इसे दैवीय चमत्कार मानकर लकड़बग्घे को देवात्मा की संज्ञा दे रहे थे। इसी सिलसिले में सभी शाकाहारी जीव लकड़बग्घे की माँद पर एकत्र हुए ।
       “हे महान प्राणी! आपके इस फैसले से समस्त शाकाहार जगत उपकृत हुआ है। हमसे आपको समझने में भूल हुई है। हमें क्षमा करें।
        ‘साथियों! मैं मानता हूँ कि मांस भक्षण मेरे इस शरीर की कमजोरी है, पर अब मुझे दैवीय ज्ञान की प्राप्ति हो गयी है । अब जीव-हत्या मुझे स्वीकार्य नहीं। मुझे अपने पापों का प्रायश्चित करने दीजिये" लकड़बग्घा रोने लगा
        “नहीं प्रभु! ऐसा अनर्थ न कीजिये। जंगल को आप जैसी देवात्मा की शख्त ज़रुरत है। हम सब शाकाहारियों ने तय किया है कि आज से हमारे समूह में मृत्यु को प्राप्त जीवों के नश्वर शरीर आपको समर्पित होंगे। हमें निराश न कीजिये" शाकाहारियों के मुखिया बारहसिंघे ने करबद्ध निवेदन किया।                                                                    

      अब जब भी जंगल में कोई जीव मरता, शाकाहारी उसे लकड़बग्घे की माँद तक पहुंचा आते। महीनो तक ऐसा चलता रहा। सभी जानवरों ने जंगल में कायम हुई शांति को देखते हुए लकड़बग्घे के नेतृत्व में लोकतंत्र बना लिया।
       एक दिन जंगल सभा में-
      “साथियों! पिछले कुछ महीनों में बहुत से निरीह शाकाहारी गायब हुए है। मुझे अंदेशा है इन सभी घटनाओं के पीछे लकड़बग्घे का ही हाथ है।"
      सभी सभासदों ने गजराज की आशंका सहित जंगल की सभी समस्याओं पर गहन मंथन किया और एक स्वर में गजराज की आशंका को सिरे से नकार दिया|
       पर गजराज अपनी खोजबीन में लगा रहा।
       और एक दिन कुछ पुख्ता सबूतों के साथ लकड़बग्घे की माँद तक पहुंच गया।
      "तो इन सभी जीव-हत्याओं के पीछे तुम ही हो। मुझे पता था कि तेरे जैसे धूर्त प्राणी का हृदय परिवर्तन कदापि नहीं हो सकता। तुमको शर्म नहीं आयी निरीह जीवों को पागल बनाते हुए?
     "हीं हीं हीं हीं!....मैंने कब पागल बनाया किसी को। मैंने तो बस इतना कहा था कि मै कभी जीव-हत्या नहीं करूँगा। पर इसका ये मतलब तो नहीं कि मेरे अनुचर और बच्चे ताज़े मांस से वंचित रहें...हीं हीं हीं हीं।
      और तुम क्यों व्यथित होते हो गजराज! शायद तुम्हे ज्ञात नहीं, पर अकाल को देखते हुए तुम्हारे लिए सैंकड़ों एकड़ पर गन्ने उगाने का प्रोजेक्ट मैं बहुत पहले ही पारित कर चूका हूँ।“
       गजराज की आँखों से लकड़बग्घे के प्रति घृणा के बादल छंट चुके थे। लोकतंत्र एक बार फिर से विजयी हुआ।

Sunday, 27 August 2017

प्रेम और टेसू

          हर बार की तरह इस बार भी मधुमास में बसंत ने प्रेमराग छेड़ रखा था। बसंन्त का नवस्पर्श पाकर सभी शाक, पेड़-पौधे फूलों से गदरा चुके थे। पर इस बार भी टेसू पहले की भांति मूक खड़ा सबकुछ देख रहा था।अंततः बसंत ने खीजकर पूछ ही लिया-
                "तुम प्रेम के इस महारास में शेष प्रकृति की भांति श्रृंगार करके शामिल क्यों नहीं होते ? क्या तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं?
        टेसू मुस्कुरा कर बोला-
"प्रेम है !!! पर मिलन ही एकमात्र आयाम तो नहीं।"

         बसंत टेसू का आशय समझ चूका था। बसंत दबे पाँव लौट रहा था ....टेसू से विरह का पाठ पढ़कर। पूरे वन में दावानल भड़क चुका था। पतझड़ की आहट हो चुकी थी।
                           

                                   © ड़ॉ.सापेक्ष गौतम

Friday, 18 August 2017

छोटी बहुत है जिंदगी


तमाम अफ़सोस
और ये खानाबदोश जिंदगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी

बहुत कुछ करना है
बहुत कुछ पाना है
जो रेत की मानिंद फिसल रहा है
मै भी चल रहा हूँ मगर
वक्त मुझसे आगे निकल रहा है
नाकाम सी ख़्वाहिशें
और ख्वाबों की बंदगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी

मै चल रहा हूँ
अपनी ही धुन में
और जी रहा हूँ
यूँ ही बेखबर
अफ़सोस भी नहीं है
जो खो गया 
वो मेरा था भी नहीं शायद
पर जाती नहीं ये
रूह की तिश्नगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी
                                                          
                                                                © ड़ॉ.सापेक्ष गौतम