Sunday, 27 August 2017

प्रेम और टेसू

          हर बार की तरह इस बार भी मधुमास में बसंत ने प्रेमराग छेड़ रखा था। बसंन्त का नवस्पर्श पाकर सभी शाक, पेड़-पौधे फूलों से गदरा चुके थे। पर इस बार भी टेसू पहले की भांति मूक खड़ा सबकुछ देख रहा था।अंततः बसंत ने खीजकर पूछ ही लिया-
                "तुम प्रेम के इस महारास में शेष प्रकृति की भांति श्रृंगार करके शामिल क्यों नहीं होते ? क्या तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं?
        टेसू मुस्कुरा कर बोला-
"प्रेम है !!! पर मिलन ही एकमात्र आयाम तो नहीं।"

         बसंत टेसू का आशय समझ चूका था। बसंत दबे पाँव लौट रहा था ....टेसू से विरह का पाठ पढ़कर। पूरे वन में दावानल भड़क चुका था। पतझड़ की आहट हो चुकी थी।
                           

                                   © ड़ॉ.सापेक्ष गौतम

Friday, 18 August 2017

छोटी बहुत है जिंदगी


तमाम अफ़सोस
और ये खानाबदोश जिंदगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी

बहुत कुछ करना है
बहुत कुछ पाना है
जो रेत की मानिंद फिसल रहा है
मै भी चल रहा हूँ मगर
वक्त मुझसे आगे निकल रहा है
नाकाम सी ख़्वाहिशें
और ख्वाबों की बंदगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी

मै चल रहा हूँ
अपनी ही धुन में
और जी रहा हूँ
यूँ ही बेखबर
अफ़सोस भी नहीं है
जो खो गया 
वो मेरा था भी नहीं शायद
पर जाती नहीं ये
रूह की तिश्नगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी
                                                          
                                                                © ड़ॉ.सापेक्ष गौतम