हर बार की तरह इस बार भी मधुमास में बसंत ने प्रेमराग छेड़ रखा था। बसंन्त का नवस्पर्श पाकर सभी शाक, पेड़-पौधे फूलों से गदरा चुके थे। पर इस बार भी टेसू पहले की भांति मूक खड़ा सबकुछ देख रहा था।अंततः बसंत ने खीजकर पूछ ही लिया-
"तुम प्रेम के इस महारास में शेष प्रकृति की भांति श्रृंगार करके शामिल क्यों नहीं होते ? क्या तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं?
टेसू
मुस्कुरा कर बोला-
"प्रेम है !!! पर मिलन ही एकमात्र आयाम तो नहीं।"
बसंत टेसू का आशय समझ चूका था। बसंत दबे पाँव लौट रहा था ....टेसू से विरह का पाठ पढ़कर। पूरे वन में दावानल भड़क चुका था। पतझड़ की आहट हो चुकी थी।
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