स्वयंवर
जिन दिनों की यह घटना है, उन दिनों भारत में आज जैसी
ही सामाजिक परिस्थितियाँ थी और छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बन जाया करता था| एक दिन किसी
बड़े शहर में एक अफवाह फैली कि एक पिता अपनी नवयौवना बेटी का स्वयंवर, माफ़ कीजिये नीलामी
कर रहा है| स्वयंवर समारोह तीन-चार दिनों तक चलना था|
स्वयंवर
के पहले दिन ही भीड़ शहर से निकल कर चल पड़ी| सारी घटना शहर से दूर उस मकान में घटी,
जहाँ आज से बीस साल पहले इसी तरह एक नवयौवना को स्वयंवर में जीतकर लाया गया था|
लोग जमा
हो गए थे, जो सभी एक ही श्रेणी के थे - परम्पराओं में जकड़े हुए ...अभिजात्य वर्ग के धनवान, कलाप्रेमी, पेशेवर शालीन लोग| स्वयंवर
के लिए की गयी व्यवस्थाओं में गौर करने लायक बस एक मंच था, जहाँ स्वयंवर की सभी रस्में पूरी होनी थी|
स्वयंवर
के पहले दिन एक अधेड़ मंच पर आया| अधेड़ के हुलिए और अधपके बालों से बुढ़ापा झाँक रहा
था|
फ़िलहाल
हम व्यवहारिक तौर पर हम अधेड़ को "अ" और उसकी नवयौवना बेटी को "क"
कहकर पुकारेंगे|
अ ने अपनी
भूमिका में कहा -" मैं आज अपनी बेटी क के स्वयंवर की घोषणा करता हूँ| जो भी दावेदार
सबसे प्रभावी होगा, वही क के योग्य वर होगा| स्वयंवर के बाद क को चौबीस घंटे की मौहलत
देनी होगी ताकि वो अपने चाहने वालों से आखिरी बार मिल सके और मैं सभी सज्जनों को इस
स्वयंवर के उपलक्ष्य में उपहार भेंट कर सकूँ| सबसे प्रभावी दावेदार का क से काम लेने
का ही नहीं बल्कि उसकी जान लेने का भी अधिकार होगा, लेकिन परम्पराओं के दायरे में रहकर
ही|
पहले दिन की करवाई शुरू हुई| सज-धजकर आये सभी दावेदारों
को एक पंक्ति में बिठा दिया गया| सभी ने एक साथ मिटटी के एक ढेले पर लाल तिलक लगाया
और कपास का एक लाल डोरा बाँधा| फिर भीड़ ने सभी दावेदारों पर पीले चावल और फूल बरसाए | प्रथम
चरण ख़त्म हुआ|
दूसरा चरण शुरू हुआ| क की सहेलियां
क को लाल जोड़े में सजाकर मंच पर ले आई| सभी दावेदार मंच के सामने एक पंक्ति में आसीन
थे| सभी दावेदारों ने क को गौर से ऊपर से नीचे तक देखा और अभिवादन किया|
अंत में अ ने सभी दावेदारों के सामने
क की व्यक्तिगत विशेषताओं का विवरण दिया और घोषणा की कि जो भी दावेदार 5 लाख अशर्फियों
के साथ क को स्वीकार करना चाहे, आगे आ सकता है...लेकिन शर्त ये है कि क की अंतिम यात्रा
इसी लाल जोड़े में करवानी होगी|
सभी दावेदारों के बीच खलबली मच गयी|
बस 5 लाख अशर्फियां!!! हूँहह ...और अ और क को लानत भेजते हुए पीछे हट गए|
अ ने सभी दावेदारों से कड़ी मिन्नतें की लेकिन कोई टस से मस न हुआ|
अंत में एक कट्टर सैद्धान्तिक कलाप्रेमी
ने क को स्वीकार कर लिया|
स्वयंवर ख़त्म हुआ| शर्त के अनुसार
क को चौबीस घंटे की मौहलत दी गयी|
सभी महिलाएं ख़ुशी के गीत गाने लगी|
क भी अपने चाहने वालों से आखिरी बार मिल रही थी| अ रुआंसे मन से सभी को उपहार बाँटने
में लगा था| पूरा माहौल और भी खुशनुमा हो उठा था|
मौहलत ख़त्म होने के आखिरी घंटे में क की माँ उठी
और सभी को सम्बोधित करने आगे आई|
"आपके इस स्नेह के लिए मैं आभारी हूँ, पर मुझे
केवल इतने से ही संतोष नहीं है| मैं आपको यकीन दिलाती हूँ कि क कभी भी अपनी योजना आपके
सामने प्रकट नहीं करेगी, क्योंकि तब आप उसमे हस्तक्षेप करना चाहेंगे और समस्या के समाधान
के लिए दूसरा रास्ता अपनाने को कहेंगे| आपकी सहायता चाहे कितनी भी उदार क्यों न हो...पर
क के अनुकूल कभी नहीं होगी| वैसे भी आज के बाज़ार में औरत रूपी सिक्के का कोई व्यवहारिक
मूल्य नहीं रह गया है| अतः मैं क को उक्त कलाप्रेमी सज्जन को सौंप रही हूँ|"
उद्बोधन
समाप्त होते ही पूरा मंच तालियों कि गड़गड़ाहट से गूंज उठा और कलाप्रेमी सज्जन 5 लाख
अशर्फियों के साथ क को डोली में बिठा कर ले गया|
पर कहानी यहीं पर ख़त्म नहीं होती|
स्वयंवर के तीन-चार साल बाद वह कलाप्रेमी क से ऊब गया| उसने क के लिए अच्छे से
स्थान पर रहने की व्यवस्था कर दी| उसे सुखी रखने की चिंता में वह परेशान रहने लगा|
एक दिन वह क को बुला कर कहने लगा - मैं यह
नहीं समझ पा रहा हूँ कि अब तुम मेरे किस काम आ सकती हो, अगर तुम मुझे एक वारिस
नहीं दे सकती तो| इसलिए मैं तुम्हें आज़ाद करना चाहता हूँ, तुम कहीं भी जा सकती हो|
क ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया, लेकिन तब
तक यह बात अफवाह बनकर उन सब लोगों के बीच पहुंच चुकी थी, जिनको स्वयंवर में अ ने
उपहार भेंट किये थे| वहां उपद्रव फूट पड़े थे| क को कुल्टा घोषित कर दिया गया
था|
इससे दोनों को बहुत गहरा दुःख
हुआ - खासकर क को| क्योंकि उसकी नज़र में आज़ाद होने का अर्थ था लाल जोड़े में अंतिम
यात्रा की शर्त को तोडना और वापस उन्ही परिस्थितियों में लौट जाना , जहां उसके
जीवन का कोई मूल्य नहीं है......और इसके लिए वह बिलकुल भी तैयार नहीं थी ॥
© ड़ॉ सापेक्ष गौतम
pyaari .... :)
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