और ये खानाबदोश जिंदगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी
बहुत कुछ करना है
बहुत कुछ पाना है
जो रेत की मानिंद फिसल रहा है
मै भी चल रहा हूँ मगर
वक्त मुझसे आगे निकल रहा है
नाकाम सी ख़्वाहिशें
और ख्वाबों की बंदगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी
मै चल रहा हूँ
अपनी ही धुन में
और जी रहा हूँ
यूँ ही बेखबर
अफ़सोस भी नहीं है
जो खो गया
वो मेरा था भी नहीं शायद
पर जाती नहीं ये
वो मेरा था भी नहीं शायद
पर जाती नहीं ये
रूह की तिश्नगी
या फिर ये कहूं
छोटी बहुत है जिंदगी
© ड़ॉ.सापेक्ष गौतम

Awesome bhai...
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